Wednesday, 12 December 2012

### मैं समय हूँ ###



चलता हूँ नित ,अबिचल अबिरत ,
खींचता हुआ लकीर संसार के छाती पर ,
अपने धुन में मग्न होकर |
रखता नहीं हिसाव किसी का,
न जाने बीत गए कितने पल,
महिना ,साल ,गए निकल ,
युगों से चलता रहा हूँ मैं ,
समेटे अपने अन्दर कितने उथल पुथल |
देखा है मैंने आँखों के सामने ,
बनते हुए सभ्यता अनेक ,
राजाओं महाराजाओं के ललकार ,
खून की प्यासी तलवार की धार,
न रहा है कोई, न रहेगा कोई ,
पर, गंतब्य है मेरा अनंत अपार |
मूक साक्षी हूँ इतिहास का ,
बनते बिगड़ते ,सँवरते उजड़ते,हर एक दस्तावेज का,
हँसी आती है देख कर ,
मुझे बांधने की तारीखों में ,
मनुष्य के  असफल प्रयास का  |
न थका हूँ मैं ,न रुका हूँ मैं ,
अनंत ब्रह्माण्ड का अनंत श्रोत हूँ मैं,
न कर प्रयास मुझे बाँधने की कोशिश तारीखों मैं,
मैं तो शून्य हूँ ,इस अंत हीन प्रवाह में |


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