Friday, 3 June 2011

धरती माँ

तुम्हारे स्पर्श मात्र से ही कलि खिल उठती है,
नहीं तो ये उपवन इतना खिला खिला नहीं दिखाई देता,
तुम्हे देख आकाश हँस पड़ता है,
नहीं तो झील मिलाते तारे  क्यों दिखाई देते..|
तुम्हारे दर्शन मात्र से सागर गगन का स्पर्श करता है,
नहीं तो उसमे उत्ताल तरंगे क्यों उठती  ?
तुमको देखकर उद्यान वन रोमांचित हो उठा है,
नहीं तो मृदुल लतांत क्यों उत्पन्न होते   ?
तुमको देखकर पृथ्वी का राज्याभिषेक  होता है,
नहीं तो शस्यश्यामला लक्ष्मी क्यों दिखाई देती ?
तुम्हारी रागिनी सुन कोयल भी मौन है,
नहीं तो आम्र-कुञ्ज में उसकी कूजन सुनाई क्यों नहीं देती ?
तुम्हारे मुख की सुन्दरता से चाँद भी सरमाये,
नहीं तो बादलों में छुपने को वो आतुर न होता...|
कदाचित प्रकृति तुम्हारे दर्शन पर भूलभुलैया में पड़ गयी है,
नहीं तो प्रणय-गाथाएँ क्यों कर चलती है   ?
विश्व सदैव तुमसे प्रार्थना करता है,
नहीं तो प्रणव का अबिरल गीत क्यों सुनाई दे रहा है  ?